आर.एस.शर्मा
पैंशनर वर्ग के लिए असमानता क्यों? जबकि सेवानिवृति के बाद पैंशन प्राप्त करना उसका मौलिक अधिकार है। यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट मे दायर निर्णय के लिए लंबित एक मुकदमे में भी स्वीकृत किया जा चुका है। पिछले दो दषक से ज़्यादा समय से बैंक पैंशनरों के साथ लगातार किए जा रहे अन्याय के प्रति सरकार और कर्मचारी यूनियनस या एसोसियेषनो की उदासीनता हैरान करने वाली है। सीमित समय के उपरान्त पैंषन का अपडेषन किया जाना वैसे ही लाज़िमी है जैसे नियमित कर्मचारियों का किया जाता है। अफसोस की बात है कि सरकार ने पिछले 10 साला वेतन आयोगो में कर्मचारी और रिटायरिज़ दोनो के वेतनों में संषोधन किए परन्तु बैंको में पिछले 5 साला अवधि के बाईपरटाईट के अंर्तगत हुए 4 वेतन संमझोतो में नियमित स्टाफ का तो ध्यान रखा परन्तु पैंशनरों को इस लाभ से वंचित कर दिया । बैंक रिटायरीज़ के लिए भारतीय कानून अंधा कैसे बन गया।
बैंको मे पैंशन,पैंशन अधिनियम 1995 के अंतर्गत लागू की गई जिसका नोटिफिकेशन सभी बैंकों द्वारा स्वीकृत भी किया गया । फिर इन नियमों की लगातार अवहेलना क्यों की जा रही हैं। अपने पैंशन फंड से उन्हें लाभ क्योकर नहीं दिए जा रहे। पैंशन अधिनियम 1995 के अंतर्गत सेवानिवृति के बाद कर्मचारी को उसके मूल वेतन,विषेष भत्ता एंव महंगाई भत्ता (आधार 1684 पवाईंटस) के पिछले 10 माह की औसत की आधार पर पैंशन तय की जानी हैै जो कभी भी नही की गई और यह आज तक विसंगति बनी हुई है।
आज बैंक रिटायरीस में बडा रोष है,न्याय के लिए दर दर भटक रहा है,देष की अदालतों मे मुकदमें दायर हो रहे हैं और बुढापे में उनके साथ अपनाया जा रहा रवैया खल रहा है। अपने ही जमा कोष से उन्हें सही पैंशन नही मिल रही है।
हल एक ही है कि नवम्बर 97 से हुए अब तक के पिछले चार बैंक के द्विपक्षीय वेतन संमझोतो के अनुसार उनकी पैंशन पुर्ननिर्धारित की जाए ताकि उनका जीवन यापन सही हो सके । फैमिली पैंशन का प्रतिषत बढाया जाए। चिकित्सा सुविधा मुफत या कम खर्चे वाली की जाए।
आज स्थिति यह है कि इस विसंगति के कारण सरकार का चपरासी बैंक के उच्चाधिकारी से भी ज्यादा पैंशन ले रहा है। सरकार पैंशनरों को पैंशन आम आदमी के टैक्स से चुकाती है जबकि बैंक पैंशनरों को पैंशन उसके अपने पैंशन फंड से ही मिलती है जिससे बैंक की लाभ हानि का कोई सरोकार नहीं।
स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है और सरकार को फैसला ष्षीघ्र ही लेना पडेगा, कहीं ऐसा न हो की बैंक पैंशनर सड़कों पर उतरकर इन्साफ ही न मांगने लग जाएं ।